हिंदुस्तान की पहचान रोटी कपड़ा मकान से शुरू होती है। इस चीज को बखूबी निर्देशक मनोज कुमार ने 1974 में सिल्वर स्क्रीन पर उतारने की की कोशिश की। तर्क साफ है जिस तरह से कांग्रेस अपना मेनिफेस्टो सामने रखते हैं। उनको अगर टटोलना शुरू कीजिएगा तो उसमें साफ तौर पर देखा गया की अब सत्ता को भी चिंता सताने लगी है अगर हम ग्रामीण भारत की तरफ देखेंगे तभी हम एक नए भारत को गढ़ सकते हैं। बकायदा उन्होंने मंच से जो लव निकाले उसमें उन्होंने किसान के लिए एक अलग बजट लाने का जिक्र किया। 23 मार्च 2020 तक 2000000 नौकरी दिलाने का जिक्र किया। युवाओं को कहीं भी रोजगार शुरू करने के बारे में जिक्र किया। ऐसे तमाम योजनाओं का जिक्र उनके 55 पेज के मेनिफेस्टो में हैं। मौजूदा वक्त में जिस तरह से मोदी सत्ता के द्वारा ताना-बाना बुना जाता है। ऐसे लगता है आजादी के बाद से 2019 का चुनाव ही सब कुछ है। 2019 के आश्रय अगर देखा जाए तो मोदी सत्ता उस मेनिफेस्टो पर खरे नहीं उतर पाए जो मेनिफेस्टो को लेकर चुनाव के मैदान में कूदे थे। उन्होंने कहा हमारी सरकार आएगी तो दो करोड़ प्रत्येक वर्ष रोजगार दिया जाएगा। लोकपाल लेकर आएंगे। काला धन का जिक्र बकायदा उन्होंने जोर शोर से किया। यह बात किसी से छुपी नहीं है कि ₹1500000 सब के खाता में डालने का जिक्र किया। जरा इन बातों को समझने की कोशिश कीजिए इन कामों में से कोई नजर आता है। कालाधन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मोदी सत्ता को यहां तक कह दिया कि 24 घंटे के अंदर काले धन का लिस्ट जारी करें। लेकिन कोई जवाब नहीं कोई रुचि नहीं दिखाई।
वोट बैंक की राजनीति जिस तरह से जातीय समीकरण पर आती है तो सबसे पहले बिहार का जिक्र जातीय समीकरण पर हो उठता है। जातीय समीकरण बिहार ही नहीं समूचे देश में सत्ता का मतलब सब कुछ है और सब कुछ का मतलब उस आम से खास तक उसे हक को अपनी मुट्ठी में रखना है। जिसे संसदीय राजनीति में लोकतंत्र का नाम दिया जाता है। जाहिर है बिहार में इसकी परिभाषा इस मायने में थोड़ी अलग है क्योंकि सत्ता तक पहुंचने की कवायद के तरीके भी सत्ताधारी समाज तय करता रहा है। बिहार में नक्सली जमीन में बीज भी सता ने लौट चलें बीते वर्ष में तो जहानाबाद सिसटर औरंगाबाद जिला भी नक्सल प्रभावित इलाका है। 1989 के लोकसभा चुनाव में औरंगाबाद जिले के परियावा गांव में एक पोस्टर लगा जनतंत्र को जनता तक पहुंचाने के लिए इनका को वोट दें। त्रासदी है कि गांव के हरिजनों ने कभी वोट दिया ही नहीं है। 70 साल के रविदास ने अपना जीवन में कभी मत पत्र देखा ही नहीं रविदास की माने तो वोट बाबू लोग देते हैं। इस गांव का जिक्र इसलिए की क्योंकि यह उस समय के कांग्रेसी मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिंह का गांव है और सत्येंद्र बाबू बाबू समाज के ही हैं तो क्या 90 मैं सत्ता पलटते बाबू समाज का फुल हो गया। लालू यादव के सामाजिक न्याय ने जमीन उलट थी और 2005 में नीतीश भाजपा के पिक्चर ने जातीय गोलबंदी खत्म होने का आदेश दे दिया। दरअसल बाबू का चिंतन जातीय गोलबंदी से ऊपर की समझ है। लालू युग में लालू बापू हो गए। जातीय वरिष्ठता की परिभाषा वही रही सिर्फ जातियों का अंदाज बदल गया। बिहार या राजपूत ब्राह्मण की जगह यादव ने ले ली। यानी मिजाज नहीं बदला तो नक्सली आंदोलन को जमीन में 20 भावों ने ही क्यों बोया या जहानाबाद से महज 20 किलोमीटर दूर पटना जिले में होने वाली बेलची से समझा जा सकता है। मिर्ची सामंती समाज की पहली प्रयोगशाला थी। जहां गरीब पिछड़ी जाति के लोग को जिंदा जलाकर भस्म कर देने की अभिनव प्रयोग बाबू ने जश्न बना कर किया। 27 मई 1977 को गरीबी जाति के 11 लोगों के जिस्म को रस्सी से बांधकर सूअर की तरह दिनभर आगमन सुबह से शाम तक चलता रहा। अंदाज इतना भयानक इसलिए था ताकि जिंदा जलती लाशों की चिरांद गाना गंद और उसे आकाश में उठते धुएं का गुबार दूरदराज गांव के लोग सॉन्ग हैं देखें और समझे भी कि समाज के दबंग बाबुओं से मोर्चा लेने का अंजाम क्या होता है। इसके पहले करवट बदलते गरीब हरिजन आदिवासी को मारा-पीटा जाता था। झोपड़ियां जलाई जाती थी। लूटा जाता था। लेकिन बेलछी कांड ने अचानक हर किसी को प्रयोग की अनूठी सीख दी हमें लगता है।
इन बातों का जिक्र मैंने इसलिए किया क्योंकि जिस तरह से मौजूदा वक्त में मोदी सत्ता हर किसी पर अपना ताना-बाना बुन रही है। हर किसी को अपने अंडर में लाना चाहती है ऐसा कांग्रेस सरकार नहीं चाहती थी और हां एक बार इंदिरा गांधी ने जरूर प्रयास किया था कि राजनीति को इस तरह से बना दिया जाए कि कोई गरीब तबका चुनाव लड़ ही ना सके और इसका फायदा बकायदा हमको मिलता रहे और मोदी सत्ता ने उनसे भी कहीं आगे बढ़कर चुनाव को इतना महंगा कर दिया कि कोई चुनाव लड़ने की तो छोड़िए सोचना भी नहीं चाहता कि हम राजनीति में जाएं अगर हम इतिहास को देखें तो राजनीति में जो कोई भी आया है। उनके घराने से ही जन्म लेता है तो क्या यह मान लिया जाए वाकई में 2019 का चुनाव भारत देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
वोट बैंक की राजनीति जिस तरह से जातीय समीकरण पर आती है तो सबसे पहले बिहार का जिक्र जातीय समीकरण पर हो उठता है। जातीय समीकरण बिहार ही नहीं समूचे देश में सत्ता का मतलब सब कुछ है और सब कुछ का मतलब उस आम से खास तक उसे हक को अपनी मुट्ठी में रखना है। जिसे संसदीय राजनीति में लोकतंत्र का नाम दिया जाता है। जाहिर है बिहार में इसकी परिभाषा इस मायने में थोड़ी अलग है क्योंकि सत्ता तक पहुंचने की कवायद के तरीके भी सत्ताधारी समाज तय करता रहा है। बिहार में नक्सली जमीन में बीज भी सता ने लौट चलें बीते वर्ष में तो जहानाबाद सिसटर औरंगाबाद जिला भी नक्सल प्रभावित इलाका है। 1989 के लोकसभा चुनाव में औरंगाबाद जिले के परियावा गांव में एक पोस्टर लगा जनतंत्र को जनता तक पहुंचाने के लिए इनका को वोट दें। त्रासदी है कि गांव के हरिजनों ने कभी वोट दिया ही नहीं है। 70 साल के रविदास ने अपना जीवन में कभी मत पत्र देखा ही नहीं रविदास की माने तो वोट बाबू लोग देते हैं। इस गांव का जिक्र इसलिए की क्योंकि यह उस समय के कांग्रेसी मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिंह का गांव है और सत्येंद्र बाबू बाबू समाज के ही हैं तो क्या 90 मैं सत्ता पलटते बाबू समाज का फुल हो गया। लालू यादव के सामाजिक न्याय ने जमीन उलट थी और 2005 में नीतीश भाजपा के पिक्चर ने जातीय गोलबंदी खत्म होने का आदेश दे दिया। दरअसल बाबू का चिंतन जातीय गोलबंदी से ऊपर की समझ है। लालू युग में लालू बापू हो गए। जातीय वरिष्ठता की परिभाषा वही रही सिर्फ जातियों का अंदाज बदल गया। बिहार या राजपूत ब्राह्मण की जगह यादव ने ले ली। यानी मिजाज नहीं बदला तो नक्सली आंदोलन को जमीन में 20 भावों ने ही क्यों बोया या जहानाबाद से महज 20 किलोमीटर दूर पटना जिले में होने वाली बेलची से समझा जा सकता है। मिर्ची सामंती समाज की पहली प्रयोगशाला थी। जहां गरीब पिछड़ी जाति के लोग को जिंदा जलाकर भस्म कर देने की अभिनव प्रयोग बाबू ने जश्न बना कर किया। 27 मई 1977 को गरीबी जाति के 11 लोगों के जिस्म को रस्सी से बांधकर सूअर की तरह दिनभर आगमन सुबह से शाम तक चलता रहा। अंदाज इतना भयानक इसलिए था ताकि जिंदा जलती लाशों की चिरांद गाना गंद और उसे आकाश में उठते धुएं का गुबार दूरदराज गांव के लोग सॉन्ग हैं देखें और समझे भी कि समाज के दबंग बाबुओं से मोर्चा लेने का अंजाम क्या होता है। इसके पहले करवट बदलते गरीब हरिजन आदिवासी को मारा-पीटा जाता था। झोपड़ियां जलाई जाती थी। लूटा जाता था। लेकिन बेलछी कांड ने अचानक हर किसी को प्रयोग की अनूठी सीख दी हमें लगता है।
इन बातों का जिक्र मैंने इसलिए किया क्योंकि जिस तरह से मौजूदा वक्त में मोदी सत्ता हर किसी पर अपना ताना-बाना बुन रही है। हर किसी को अपने अंडर में लाना चाहती है ऐसा कांग्रेस सरकार नहीं चाहती थी और हां एक बार इंदिरा गांधी ने जरूर प्रयास किया था कि राजनीति को इस तरह से बना दिया जाए कि कोई गरीब तबका चुनाव लड़ ही ना सके और इसका फायदा बकायदा हमको मिलता रहे और मोदी सत्ता ने उनसे भी कहीं आगे बढ़कर चुनाव को इतना महंगा कर दिया कि कोई चुनाव लड़ने की तो छोड़िए सोचना भी नहीं चाहता कि हम राजनीति में जाएं अगर हम इतिहास को देखें तो राजनीति में जो कोई भी आया है। उनके घराने से ही जन्म लेता है तो क्या यह मान लिया जाए वाकई में 2019 का चुनाव भारत देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

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