लोकसभा चुनाव में इस बार दल-बदलुओं की भरमार है। एक पार्टी में जीवन खपाने वाले जमे-जमाए नेता दूसरी पार्टी में ऐसे प्रवेश कर रहे हैं जैसे उस पार्टी के बगैर उनका जीवन अधूरा ही रह जाएगा। दल-बदलुओं के इस खेल से चुनावी राजनीति का चेहरा बदरंग हो रहा है। 27 साल भाजपा में बिताकर शत्रुघ्न सिन्हा 28 मार्च को कांग्रेस का दामन थामने जा रहे हैं। 1992 में राजेश खन्ना से चुनाव हारने के बाद उन्होंने कहा था कि चुनाव लड़ना उनकी सबसे बड़ी भूल थी। वे अब चुनाव लड़ने के लिए कांग्रेस में शामिल हो रहे हैं। भाजपा में वे दो बार सांसद और एक बार राज्यसभा से मंत्री भी बन चुके हैं। देश में हर प्रदेश में इस बार भारी मात्रा में नेताओं ने चेहरा बदला है। राजस्थान में घनश्याम तिवाड़ी पूरी ज़िंदगी भाजपा में रहकर मंगलवार को कांग्रेसी हो गए। कीर्ति आजाद, जयाप्रदा सरीखे नेताओं की भाषा बदल गई है।
पश्चिम बंगाल में भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस के बड़े नेताओं को अपने पाले में कर लिया। भाजपा आज ममता की पार्टी छोड़कर आए इन्हीं नेताओं के भरोसे चुनाव मैदान में है। मजेदार बात यह है कि हिमाचल में सुखराम जैसे नेता कांग्रेस से भाजपा में और फिर भाजपा से कांग्रेस में आ गए। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खंडूरी ने अपने बेटे मनीष के जरिए कांग्रेस का दामन थाम लिया। कोई भी पार्टी इसमें दूध की धुली नहीं है। सवाल यह उठता है कि पार्टी छोड़ने या नई पार्टी ज्वाइन करने की क्या कोई आचार संहिता नहीं होनी चाहिए? यह कैसे संभव है कि एक नेता कल तक जिनके जयकारे लगाता था वह अचानक उनकी खिलाफत पर उतर आए। यह हृदय परिवर्तन नहीं, मौकापरस्ती है। मौका परस्तों को अवसर न देकर राजनीति में पार्टियों को नई पहल करनी चाहिए। वह नेता जो अपने फायदे के लिए विचारधारा बदलने को तैयार हो जाता है वह अपने संसदीय क्षेत्र की जनता का कितना ध्यान रखता होगा, यह आसानी से समझा जा सकता है। अगर राजनीतिक दल फायदे के लिए दल-बदलुओं का इस्तेमाल करते हैं तो अब मतदाताओं को ऐसे उम्मीदवारों को सबक सिखाना चाहिए। टिकट कटने व टिकट देने का खेल भी बड़ा निराला है। क्षेत्रीय दलों में जब टिकट बेचने और खरीदने की चर्चा आम है तो उन्हें कैसे उम्मीदवार मिलेंगे? राजनीति का व्यवसायीकरण सबसे बड़ी चिंता है। पार्टी चाहे जो भी हो सबका एक ही पैटर्न है। बस जीत चाहिए किसी भी कीमत पर।
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