दक्षिण के राज्यों में अगर बहुत पहले से नहीं तो भी कम से कम 1960 के दशक से अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण का प्रावधान चला आ रहा था |बाहर बहरहाल उत्तर भारत के राज्य में लागू नहीं थी 1977 से 79 की जनता पार्टी की सरकार के समय उत्तर भारत में पिछड़े वर्ग के आरक्षण के लिए राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से आवाज उठाई गई बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर इस दिशा में अग्रणी थे उनकी सरकार ने बिहार में ओबीसी को आरक्षण देने के लिए एक नई नीति लागू की इसके बाद केंद्र सरकार ने 1978 में एक आयोग बैठाया इसके जिम्मे में पिछड़ा वर्ग की स्थिति को सुधारने के उपाय बताने का काम सौंपा गया। आजादी के बाद से यह दूसरा अवसर था जब सरकार ने ऐसा योग नियुक्त किया इसी कारण अधिकारिक रूप से इस आयोग को दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग कहा गया आमतौर पर इस आयोग को इसके अध्यक्ष बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल के नाम पर मंडल कमीशन कहा जाता है।
मंडल आयोग का गठन भारतीय समाज के विभिन्न तबकों के बीच शैक्षिक और सामाजिक पिछड़ेपन की व्यापकता का पता लगाने और इन पिछड़े वर्गों की पहचान के तरीके बताने के लिए किया गया था आयोग ने अभी अपेक्षा की गई थी कि वह इन वर्गों के पिछड़ेपन को दूर करने के उपाय सुझाए गा। आयोग ने 1980 में अपनी सिफारिशें पेश की इस वक्त तक जनता पार्टी की सरकार गिर चुकी थी। आयोग का मशविरा था कि पिछड़ा वर्ग और पिछड़ी जाति के अर्थ में स्वीकार किया जाए क्योंकि अनुसूचित जातियों से इधर ऐसी अनेक जातियां हैं जिन्हें वर्ण व्यवस्था में नहीं समझा जाता है आयोग ने एक सर्वेक्षण किया और पाया इन पिछड़ी जातियों की शिक्षा संस्थाओं तथा सरकारी नौकरियों में बड़ी कम मौजूदगी है इस वजह से आयोग ने इन समूहों के लिए शिक्षा संस्थाओं तथा सरकारी नौकरियों में 27% सीट आरक्षित करने की सिफारिश की मंडल आयोग ने अन्य पिछड़ा वर्ग की स्थिति सुधारने के लिए और समाधान सुझाव जिनमें भूमि सुधार भी एक था।
1990 के अगस्त में राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों में से एक को लागू करने का फैसला किया यह सिफारिश केंद्र सरकार और उनके उपकरणों की नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने के संबंध में थी सरकार के फैसले से उत्तर भारत के कई शहरों में हिंसक विरोध का स्वर उमरा इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई और यह प्रक्रम इंदिरा साहनी केस के नाम से प्रसिद्ध हुआ सरकार के फैसले के खिलाफ अदालत में जिन लोगों ने अर्जी दायर की थी उनमें एक नाम इंद्रा साहनी का भी था 19 नवंबर में सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार के निर्णय को सही ठहराते हुए अपना फैसला सुनाया राजनीति दलों में इस फैसले के क्रियान्वयन के तरीकों को लेकर कुछ मतभेद था बाहर हाल अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने के मसले पर देश के सभी बड़े राजनीतिक दलों में सहमति थी।
बि. पी मंडल 1968 में डेढ़ माह तक बिहार के मुख्यमंत्री पद पर रहे। 1967-1970 तथा 1977-1979 में बिहार में संसद चुने गए।

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